रविवार, 6 नवंबर 2011

मैं जब देखता हू -मील के पत्थर को
तो आने लगते हैं कुछ ख्याल
न जाने कितने वर्षो से मूक खड़ा हे
चुपचाप गडा हे सड़क के किनारे
बन कर शाख्शी न जाने कितने खुले अधखुले
इतिहास के प्रष्टो का
देखा हे उसने अपने ही परिवार का विभाजन
जब किसी रेड्क्लिफ्फ़ ने बाँट दिया था न सिर्फ उसके
देश को बल्कि पथरो के उसके परिवार को भी जो फेला था
कटक से अटक तक
खड़ा रहकर एक जगह वह बता देता हे सबको उनकी
मंजिल का पता
मैं ही नहीं सारा देश ही इस समय तलाश रहा हे
मील का पत्थर जो दिखा सके रास्ता देश की भटकी हुई गाड़ी को

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    देवोत्थान पर्व की शुभकामनाएँ!

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  2. प्रणाम भाई साहब
    कृपया मार्ग दर्शन करे
    साहित्य साधना की राह बड़ी कठिन हे

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